मसूरी – म्युनिसिपल पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज, मसूरी (देहरादून) के रसायन विज्ञान विभाग द्वारा उत्तराखण्ड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (UCOST) के सहयोग से “Intellectual Property and Patent Writing for Academic and Technological Innovations” विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन दिनांक 28 फरवरी 2026 को सफलतापूर्वक संपन्न किया गया।
कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन, सरस्वती वंदना एवं स्वागत गीत के साथ में हुआ। महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ आर पी एस चौहान द्वारा मुख्य अतिथि प्रो. प्रशान्त सिंह एवं विशिष्ट अतिथि श्री मनोज रयाल जी का पुष्पगुच्छ एवं स्मृति-चिह्न प्रदान कर स्वागत एवं सम्मान किया गया। तत्पश्चात् कार्यशाला की संयोजिका डॉ. रुचि बडोनी सेमवाल द्वारा स्वागत उद्बोधन प्रस्तुत किया गया। अपने संबोधन में उन्होंने विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों को शोध, नवाचार तथा बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) के प्रति जागरूक होने का संदेश देते हुए नवाचार आधारित शिक्षा की आवश्यकता पर विशेष बल दिया।
तकनीकी सत्रों में आमंत्रित विशेषज्ञ वक्ताओं ने IPR एवं पेटेंट लेखन के विविध आयामों पर विस्तृत एवं ज्ञानवर्धक व्याख्यान प्रस्तुत किए। प्रो. एच. सी. पुरोहित ने नवाचार, उद्यमिता एवं राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में बौद्धिक संपदा की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि अनेक महत्वपूर्ण नवाचार ऐसे हैं जिनका समय पर पेटेंट नहीं कराया जाता, जिसके कारण उनके वास्तविक लाभ सीमित रह जाते हैं। उन्होंने विद्यार्थियों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने, सृजनात्मक सोच अपनाने तथा औद्योगिक नवाचार की दिशा में कार्य करने के लिए प्रेरित किया। साथ ही द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हुए विभिन्न वैज्ञानिक नवाचारों का उल्लेख करते हुए तकनीकी प्रगति एवं वैज्ञानिक सोच के महत्व को स्पष्ट किया।
मुख्य अतिथि प्रो. प्रशान्त सिंह ने IPR की मूल अवधारणाओं, महत्व तथा शैक्षणिक एवं औद्योगिक क्षेत्र में इसकी उपयोगिता को सरल एवं प्रभावी ढंग से समझाया। उन्होंने कहा कि केवल शोध-पत्र प्रकाशित करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि शोध से प्राप्त ज्ञान का उपयोग औद्योगिक नवाचार एवं उसके वाणिज्यीकरण (Commercialization) के लिए भी किया जाना चाहिए। उन्होंने उच्च शिक्षा संस्थानों एवं उद्योगों के मध्य समन्वय की आवश्यकता पर बल देते हुए बताया कि IPR प्रक्रिया उत्पाद, प्रक्रिया एवं शोध कार्य—सभी पर समान रूप से लागू होती है। उन्होंने पेटेंट, ट्रेडमार्क, कॉपीराइट, व्यापारिक रहस्य एवं औद्योगिक संपदा के मध्य अंतर स्पष्ट करते हुए लाइसेंसिंग एवं वाणिज्यीकरण के अवसरों पर भी प्रकाश डाला। इसके अतिरिक्त उन्होंने नैतिक शोध आचरण, विद्यार्थियों के सशक्तिकरण, ऑनलाइन पाठ्यक्रम एवं प्रमाणपत्रों तथा IPR से संबंधित सहयोग प्रदान करने वाले विभिन्न संगठनों की जानकारी दी।
प्रो. एम. के. गुप्ता ने कॉपीराइट एवं ट्रेडमार्क की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए रचनात्मक कार्यों की सुरक्षा एवं ब्रांड पहचान के महत्व को स्पष्ट किया। उन्होंने बौद्धिक संपदा के पारंपरिक एवं उभरते क्षेत्रों, भौगोलिक संकेतक (Geographical Indications), पादप किस्मों (Plant Varieties) तथा वैश्विक स्तर पर IPR की संरचना के विषय में विस्तृत जानकारी दी। साथ ही विश्व व्यापार संगठन (WTO), संबंधित अधिनियमों एवं ट्रेडमार्क पंजीकरण की आवश्यक प्रक्रियाओं पर चर्चा करते हुए बौद्धिक संपदा अधिकारों को सृजनकर्ता के लिए एक वैधानिक संरक्षण के रूप में वर्णित किया तथा पंजीकरण की अनिवार्यता पर विशेष जोर दिया।
तकनीकी सत्र में डॉ. आशीष कुमार ने पेटेंट संरचना, ड्राफ्टिंग तकनीक एवं फाइलिंग प्रक्रियाओं पर चरणबद्ध मार्गदर्शन प्रदान किया। उन्होंने बताया कि किसी भी आविष्कार के पेटेंट योग्य होने के लिए उसका नवीन (Novel), उपयोगी (Useful) तथा औद्योगिक रूप से अनुप्रयोग योग्य होना आवश्यक है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि खतरनाक रासायनिक पदार्थों अथवा परमाणु ऊर्जा से संबंधित कुछ आविष्कारों पर पेटेंट प्रदान नहीं किया जाता। साथ ही उन्होंने पेटेंट आवेदन कौन कर सकता है, पेटेंट आवेदन कहाँ और किस प्रकार दाखिल किया जाता है, पेटेंट फॉर्म की संरचना तथा आवश्यक दस्तावेजों के विषय में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने शोध एवं पेटेंट खोज को सुदृढ़ बनाने हेतु AI आधारित उपकरणों जैसे Google Patents, Semantic Scholar, Research Rabbit, Paperpal आदि के उपयोग की उपयोगिता पर भी प्रकाश डाला।
एक अन्य सत्र में डॉ. दीपक कुमार सेमवाल ने “Real Life Innovations में IPR तत्वों की पहचान” विषय पर केस स्टडी आधारित व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने वास्तविक जीवन के उदाहरणों के माध्यम से नवाचार की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए बताया कि रचनात्मक एवं निर्माणात्मक सोच से ही सार्थक नवाचार का विकास होता है तथा प्रत्येक विचार पेटेंट योग्य नहीं होता। उन्होंने यह भी बताया कि हानिकारक, अनैतिक अथवा समाज के लिए अनुपयोगी नवाचारों को पेटेंट प्रदान नहीं किया जाता। उन्होंने नवाचार के विभिन्न क्षेत्रों जैसे लोक ज्ञान, भाषा एवं पारंपरिक ज्ञान पर चर्चा करते हुए पेटेंट योग्य (Patentable) एवं अपेटेंट योग्य (Non-Patentable) कार्यों के मध्य स्पष्ट अंतर समझाया तथा पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण एवं उसके नैतिक उपयोग के महत्व पर विशेष बल दिया।
कार्यशाला में महाविद्यालय के प्राध्यापकगण, शोधार्थी एवं विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता करते हुए विषय से संबंधित महत्वपूर्ण एवं व्यावहारिक जानकारी प्राप्त की। कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन सह-संयोजक डॉ. तुषार कण्डारी द्वारा प्रस्तुत किया गया, जिसमें सभी वक्ताओं, अतिथियों एवं प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया गया। कार्यशाला का संचालन शोधार्थी श्वेता पटेल द्वारा किया गया।
कार्यशाला की संयोजिका डॉ. रुचि बडोनी सेमवाल, सह-संयोजक डॉ. तुषार कण्डारी तथा आयोजन समिति की सदस्य डॉ. वर्षा एवं कु. मैत्रेयी शाह कार्यक्रम में सक्रिय रूप से उपस्थित रहे तथा कार्यक्रम के सफल आयोजन एवं संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
