मसूरी गोलीकांड में शहीद हुए डीएसपी उमाकांत त्रिपाठी को भारत सरकार के गृहमंत्रालय ने 32 साल पहले दे दिया था शहीद का दर्जा : रवींद्र जुगराण

: राज्य आंदोलनकारी विगत कई वर्षों से कर रहे थे त्रिपाठी को शहीद का दर्जा देने की मांग, आंदोलनकारियों सहित त्रिपाठी के परिवार में खुशी की लहर।

मसूरी – उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी परिषद के पूर्व अध्यक्ष रवीद्र जुगराण ने मसूरी गोलीकांड में शहीद हुए तत्कालीन डीएसपी उमाकांत त्रिपाठी की शहादत को भारत सरकार गृह मंत्रालय ने 32 वर्ष पहले ही उन्हें शहीद का दर्जा दे दिया था, लेकिन आश्चर्य की बात है कि इसका पता न तो उत्तराखंड की जनता को, न ही प्रदेश सरकार को ,न ही पुलिस मुख्यालय को, न ही प्रदेश सरकार के गृह मंत्रालय को, न ही उमाकांत त्रिपाठी के परिवार को था और मसूरी राज्य आंदोलनकारी मंच सहित प्रदेश के आंदोलनकारी लंबे समय से उनको शहीद का दर्जा देने की मांग करते रहे हैं। जो सरकार की नाकामी है।

मसूरी में पत्रकारों से बात चीत करते हुए उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी परिषद के पूर्व अध्यक्ष रवीद्र जुगराण ने कहा कि राज्य निर्माण के लिए मसूरी गोलीकांड 1994 में हुआ था जिसमें छह आंदोलनकारियों के साथ डीएसपी ने शहादत दी थी। और तब से उनको शहीद का दर्जा देने की मांग की जाती रही है। उन्हांने कहा कि वह लगातार उनको शहीद का दर्जा देने की मांग करते रहे व लगातार सरकार, मंत्रियों, पुलिस विभाग से संपर्क करते रहे। लेकिन तीन दिन पहले ऑन रिकार्ड पता चला कि 1995 में उन्हें शहीद का दर्जा मिल गया था। जिसके बाद उन्हें आत्मिक शांति मिली।

उन्होंने कहा कि वह लगातार इसका प्रयास करते रहे व मसूरी में हर वर्ष शहीद दिवस पर दो सितंबर को जितने भी मुख्यमंत्री आये, विधायक, मंत्री आये सभी को प्रत्यावेदन दिया व वर्तमान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से भी लगातार इस संबंध में मिलते रहे। गत आठ माह पहले ही मैं धामी से फिर मिले व उन्होंने गृह मंत्रालय उत्तराखंड को लिखा। उन्होंने पुलिस मुख्यालय को लिखा व लगातार उनसे संपर्क करत रहे व तीन दिन पहले जब पुलिस मुख्यालय में आईजी कार्मिक डा. योगेंद्र सिंह रावत से मिले व उन्हांने लगातार उत्तर प्रदेश सरकार से पत्राचार किया व उन्हांने वहां पुलिस के डाकिया को भेजा व तीन दिन पहले उन्हें ऑन रिकार्ड सूचना मिली कि उन्हें 1995 में शहीद का दर्जा मिल चुका है व दिल्ली में चाणक्यपुरी में जो शहीद स्तंभ है उसमें उनका नाम शहीदों में अंकित है।

इसके बाद उन्होंने उमाकांत त्रिपाठी की पत्नी यशोधा त्रिपाठी से मिल कर उन्हें यह सूचना दी, इसकी उनको भी कोई जानकारी नहीं थी। उनकी मांग पहले ही पूरी हो चुकी थी लेकिन देर से जानकारी मिली। उन्होंने कहा कि अब उनके परिवार से मसूरी के आंदोलनकारी मिलें व उनके परिवार का अभिनंदन व सम्मान करे। प्रदेश सरकार उनकी भव्य प्रतिमा मसूरी शहीद स्थल पर लगाये व प्रदेश सरकार शहीद को जो अनुमन्य सुविधाएं होती है उनके परिवार को दी जाय। भले ही इसकी जानकारी 32 साल बाद मिली उससे आंदोलनकारियों में खुशी है। यह व्यवस्था की नाकामी है, जिसमें हम भी शामिल है। इससे व्यवस्था की असंवेदनशीलता का पता चलता है। इस मौके पर वरिष्ठ आंदोलनकारी जय प्रकाश उत्तराखंडी ने कहा कि शहीद डीएसपी उमाकांत त्रिपाठी मृदुभाषी व ईमानदार अधिकारी थे व आंदोलनकारियों के साथ उनका अच्छा व्यवहार था। उनको दो सिंतंबर मसूरी गोली कांड में गोली लगी व वे शहीद हो गये। उनको शहीद का दर्जा देने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री के पास 2004 में गये जिन्होंने उनके कागज को फेंक दिया। उन्हांने कहा कि मसूरी के आंदोलनकारी उनके परिवार से मिलेंगे, उन्हे सम्मान दिया जायेगा व सरकार से उनकी मसूरी में प्रतिमा लगाने व उनके नाम पर सड़क का नाम रखने के साथ उनके परिवार को शहीद का सम्मान व सुविधाए देने की मांग की, वहीं सरकार को माफी मांगनी चाहिए कि उनको 32साल से शहीद का दर्जा मिलने के बाद भी उन्हें शहीद नहीं माना गया।

उत्तराखंड राज्य आंदोलकारी मंच के अध्यक्ष देवी गोदियाल ने कहा कि प्रदेश सरकार आंदोलनकारियों के साथ उचित बर्ताव नहीं करती, यह भी उसी कड़ी का हिस्सा है कि उनको शहीद का दर्जा मिलने पर भी सरकार को पता नहीं लगा। उन्होंने कहा कि जो भी राज्य आंदोलनकारी है चाहे वह सरकार व विपक्ष में विधायक है या रहे हैं उन्हें भी राजनीति से हटकर उमाकांत त्रिपाठी के सम्मान के लिए कुछ करना चाहिए। वहीं मांग की कि मसूरी राज्य आंदोलन में पुलिस की बर्बरता सहने वालों व शहीदों के नाम पर किसी न किसी संस्थान का नाम रखा जाना चाहिए उनके नाम के द्वार बनाया जाना चाहिए।

इस मौके पर अनिल पटवाल, कमल भंडारी, भाजपा के पूर्व मंडल अध्यक्ष मोहन पेटवाल, सतीश ढौडियाल, अनिल गोदियाल, नरेंद्र पडियार, टीकम रावत, सोबन मेहरा, हरीश सकलानी, पुष्पा पडियार, पुष्पा पुंडीर, राधा आनंद, चंद्रकला सयाना, राजेश्वरी नेगी, खुर्शीद अहमद, एजाज अहमद आदि आंदोलनकारी मौजूद रहे।

Vimal Nawani
Vimal Nawani

CHIEF EDITOR